मैं भी ‘दिमागी नक्सल’, महबूबा मुफ्ती का बयान; अनुच्छेद 370 को लेकर क्या कहा

Aug 17, 2026 - 02:32
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मैं भी ‘दिमागी नक्सल’, महबूबा मुफ्ती का बयान; अनुच्छेद 370 को लेकर क्या कहा

‘दिमागी नक्सल’ को लेकर महबूबा मुफ्ती का भी बयान आया है। जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री ने रविवार को कहाकि वह संविधान के अनुच्छेद 370 का समर्थन करती हैं, इसलिए वह भी एक ‘दिमागी नक्सल’ हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत पहले जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा प्राप्त था। महबूबा ने अपने ‘एक्स’ हैंडल पर एक पोस्ट किया कि मैं अनुच्छेद 370 का समर्थन करती हूं। मैं एक दिमागी नक्सल हूं। पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की अध्यक्ष केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू की एक पोस्ट पर प्रतिक्रिया दे रही थीं, जिसमें उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विपक्षी नेताओं को ‘दिमागी नक्सल’ नहीं कहा था।रिजिजू की पोस्ट पर रिएक्शनरीजीजू ने एक्स पर पोस्ट में कहाकि यह शब्द केवल उन लोगों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है जो माओवादियों का समर्थन करते हैं। जो भारतीय संविधान को खारिज करते हैं, जो अलगाववादियों के साथ खड़े हैं और अनुच्छेद 370 का समर्थन करते हैं। या ऐसे लोग जो ‘चिकन नेक’ को काटकर पूर्वोत्तर को भारत से अलग करने की कोशिश करते हैं। महबूबा ने यह टिप्पणी स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री के संबोधन में ‘दिमागी नक्सल’ से जुड़े बयान के एक दिन बाद की। स्वतंत्रता दिवस पर अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने देश को ‘दिमागी नक्सलियों’ से सावधान किया। प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया था कि ऐसे लोगों ने व्यवस्था में अपनी पैठ बना ली है और वे नीतियों को प्रभावित करके समाज के लिए खतरा बने हुए हैं। प्रधानमंत्री ने लोगों से उन्हें पहचानने एवं अलग-थलग करने की अपील की थी।चिदंबरम ने भी कहा था ऐसाइससे पहले पूर्व वित्तमंत्री और कांग्रेस सांसद पी. चिदंबरम ने कहाकि ‘मोदी जी, मैं भी दिमागी रूप से नक्सली हूं’। भाजपा सांसद रविशंकर प्रसाद ने उनके इस बयान को बेहद आपत्तिजनक और गैर-जिम्मेदाराना बताया। उन्होंने सवाल किया कि चिदंबरम देश के पूर्व गृह मंत्री, राज्यसभा सांसद और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। ऐसे में उन्हें प्रधानमंत्री के बयान के संदर्भ और उसके उद्देश्य को समझना चाहिए था।गौरतलब है कि प्रधानमंत्री ने 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से कहा था कि देश ‘हथियारी नक्सलवाद’ को जंगलों से खत्म करने में सफल रहा है, लेकिन उसके वैचारिक समर्थक हिंसा और अराजकता को बढ़ावा देने के अवसर तलाश रहे हैं।

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