कब तक करें होर्मुज खुलने का इंतजार? अब बर्फीले रास्ते से होगा व्यापार; भारत भी भेजेगा अपना जहाज
लाल सागर, स्वेज नहर और दूसरे समुद्री रास्तों पर बढ़ते तनाव और युद्ध ने वैश्विक व्यापार को समुद्री मार्गों की सुरक्षा के प्रति सतर्क कर दिया है। अब यह समझ में आ गया है कि होर्मुज के खुलने के लिए हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठा जा सकता। किसी एक रास्ते के बंद होने से जहाजों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ता है, जिससे समय और परिवहन लागत दोनों बढ़ते हैं। इसी जोखिम को देखते हुए चीन यूरोप तक पहुंचने के लिए आर्कटिक समुद्री मार्ग का इस्तेमाल बढ़ाने की तैयारी में है।20 दिन में चीन से यूरोप की यात्राइस रास्ते से चीन से यूरोप की यात्रा करीब 20 दिन में पूरी हो सकती है। फिलहाल चीन से यूरोप जाने वाले बड़े कंटेनर जहाज हिंद महासागर, अरब सागर, लाल सागर और स्वेज नहर से होकर भूमध्य सागर के रास्ते यूरोप पहुंचते हैं। आर्कटिक मार्ग में जहाज चीन के उत्तरी हिस्से से निकलकर रूस के साइबेरियाई तट के ऊपर से आर्कटिक महासागर में जाएंगे और वहां से यूरोप की ओर बढ़ेंगे।चीन को लंबे समय से चिंता है कि उसके व्यापार और ऊर्जा आयात का बड़ा हिस्सा कुछ समुद्री रास्तों पर निर्भर है। इसे उसकी ‘मलक्का दुविधा’ से भी जोड़ा जाता है। मलक्का जलमार्ग में संकट या नाकेबंदी उसके बड़ी परेशानी पैदा कर सकती है। इसीलिए चीन ‘आइस सिल्क रोड’ को केवल व्यापारिक रास्ते के रूप में नहीं, बल्कि रणनीतिक परियोजना के तौर पर भी देख रहा है। अमेरिका और यूरोप के रूस पर बढ़ते दबाव के बीच चीन-रूस सहयोग वाला यह रास्ता आने वाले समय में वैश्विक व्यापार और भू-राजनीति में अहम भूमिका निभा सकता है।भारत भी क्यों चाहता है रास्ते में हिस्सेदारी?ऊर्जा सुरक्षा, रूस से व्यापार और यूरोप से बेहतर संपर्क के कारण बढ़ रहा है। इससे रूस के आर्कटिक क्षेत्र और सुदूर पूर्व से तेल, गैस और अन्य संसाधनों की आपूर्ति आसान हो सकती है। भारत ने 2027 में इस मार्ग पर पहला जहाज परीक्षण के लिए भेजने की योजना बनाई है।यह रास्ता खास क्यों हैयह रास्ता लगभग 5,600 किलोमीटर लंबा है। रूस के आर्कटिक तट के साथ-साथ चलता है और पूर्वी एशिया को यूरोप से जोड़ने वाला सबसे छोटा शिपिंग मार्ग है। चीन से उत्तरी यूरोप तक यह रास्ता करीब 18-20 दिन में पूरा हो सकता है। इसके मुकाबले स्वेज नहर या अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के रास्ते यात्रा में 40-50 दिन तक लगते हैं। छोटा रास्ता होने से ईंधन और परिचालन लागत भी घट सकती है।समय की बचत होगीइस मार्ग का एक लाभ यात्रा का समय है। चीन से यूरोप की यात्रा में लगभग 20 दिन लगते हैं, जबकि चीन-यूरोप रेल मार्ग से लगभग 25 दिन, स्वेज नहर के रास्ते 40 दिन और केप ऑफ गुड होप के चारों ओर से जाने पर 50 दिन लगते हैं। इसका पहला परीक्षण सितंबर 2025 में हुआ। ट्रेनें 20 दिनों में फेलिक्सस्टोव पहुंच गईं, जिससे चीन-यूरोप के बीच का समय कम करने की क्षमता प्रदर्शित हुई। (हिन्दुस्तान प्रिंट के सहयोग से)
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