MS धोनी से प्रेरणा लेती हैं भारतीय गोलकीपर बिछू देवी, वर्ल्ड कप से पहले दिया ये बयान
Womens Hockey World Cup 2026: भारतीय महिला हॉकी टीम की होनहार गोलकीपर बिछू देवी ने विश्व कप में दबाव का सामना कैसे किया जा सकता है? इसकी सफलता की कुंजी उन्होंने शांत रहना बताया है। इसके लिए 'कैप्टन कूल' महेंद्र सिंह धोनी फेमस थे और बिछू देवी, उन्हें अपना आदर्श मानती हैं। उन्हीं के नक्शेकदम पर चलने की कोशिश बिछू देवी करती हैं।दूसरा विश्व कप खेल रही बिछू ने भाषा को दिये इंटरव्यू में कहा, ''धोनी जिस तरह से दबाव में भी शांत रहते हैं, मैं भी वैसा ही करने की कोशिश करती हूं। यही सोचती हूं कि डर के आगे जीत है। कितना भी दबाव सामने आये, मैं शांत रहूंगी। जब उनकी फिल्म आई तो मैंने बार-बार देखी। उन्होंने जीवन में इतना संघर्ष किया और इतनी ऊंचाई तक पहुंचे , उनसे बहुत प्रेरणा मिलती है।''भारतीय टीम को विश्व कप में पहला मुकाबला 16 जून को चीन से खेलना है और मणिपुर की 26 वर्ष की इस खिलाड़ी ने कहा कि वह सफलता के लिये बेसिक्स पर अमल करने में विश्वास रखती हैं। उन्होंने कहा, ''अब कुछ ज्यादा सोचना नहीं है। जो अब तक तैयारी की है , उसी पर फोकस है। कुछ अतिरिक्त प्रयास नहीं करना है।''पिछले विश्व कप से अब तक के सफर में बिछू की सोच में भी काफी बदलाव आया है और बड़े टूर्नामेंट या दिग्गज टीमों की ख्याति से वह डरती नहीं है। मैं पिछले विश्व कप में बिल्कुल नयी थी और बहुत दबाव ले लिया था कि इतने बड़े टूर्नामेंट में कैसे खेलूंगी लेकिन अब परिपक्वता आई है और फोकस बस अच्छे प्रदर्शन पर है।''शांत रहकर फैसले लेने हैंबिछू ने कहा ,''आक्रामक हॉकी के इस दौर में दुनिया की शीर्ष स्ट्राइकरों के सामने अब दिक्कत नहीं होती। हमने बड़ी टीमों के खिलाफ इतने मैच खेले हैं कि अब फर्क नहीं पड़ता। बस मैदान पर शांत रहकर फैसले लेने हैं जो मैं ले लूंगी।''सविता पूनिया जैसी दिग्गज गोलकीपर के टीम में होने के बावजूद अपनी पहचान बनाने वाली बिछू दरअसल हॉकी नहीं, फुटबॉल खेलना चाहती थी लेकिन ट्रायल के लिये पहुंचने में देरी होने से उनकी किस्मत बदल गई।उन्होंने बताया ,'' मैं गलती से हॉकी खिलाड़ी बनी हूं, क्योंकि मैने फुटबॉलर बनने का सपना देखा था। इम्फाल साइ सेंटर पर ट्रायल देने गई थी लेकिन एक दिन देरी होने से वेकेंसी फुल हो गई थी। वहां साइ के निदेशक ने पापा से बोला कि इसको हॉकी खेलने दो, कुछ महीने बाद फुटबॉल टीम में ले लेंगे। मैने हॉकी के सारे ट्रायल पास कर लिये लेकिन दो महीने बाद फुटबॉल टीम के लिये पूछा तो उन्होंने कहा कि साइ में अब हॉकी खिलाड़ी के रूप में नाम दर्ज हैं तो फुटबॉल नहीं खेल सकती।''उन्होंने कहा ,'' मैं बहुत रोई और पापा को बोला कि मुझे ले जाओ लेकिन उन्होंने समझाया। धीरे धीरे हॉकी में मन रमने लगा। लेकिन मैं शुरू में स्ट्राइकर थी और गोल करके जश्न मनाना मुझे अच्छा लगता था। फिर मणिपुर में नीलकमल सर साइ सेंटर आये थे जिन्होंने गोलकीपर बनाने की सलाह दी।'' मप्र अकादमी में कैरियर का आगाज करने वाली बिछू को गोलकीपर की किट भी काफी देर से मिली और मिली भी तो उनके साइज की नहीं थी।उन्होंने बताया ,''मैं मप्र अकादमी में 2015 में चली गई थी जहां से शुरूआत हुई। मुझे छह महीने बाद गोलकीपर की किट मिली लेकिन लेगगार्ड इतने बड़े थे कि कटवाकर खेलना पड़ा।'' सविता के साथ अपने रिश्ते को प्रतिस्पर्धा का नहीं बल्कि एक दूसरे से सीखने का मानने वाली बिछू ने कहा कि उनके अनुभव से काफी मदद मिलती है।बिछू ने कहा, '' सविता दी से बहुत कुछ सीखने को मिला। उनसे लगातार पूछती हूं कि दिमाग में उस समय क्या चल रहा था या फैसले कैसे लेने हैं तो वह बताती हैं कि बाहरी आवाजों पर ध्यान नहीं देना है और अपने खेल पर फोकस रखना है। एक बड़ी बहन की तरह सिखाया है और मेरे से भी सीखती हैं। मैच में गोल खाने के बाद एक दूसरे का मनोबल बढाते हैं। ‘’
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