₹10 लाख का निवेश बना ₹1.25 करोड़! इस म्यूचुअल फंड ने दिया छप्परफाड़ रिटर्न

Aug 17, 2026 - 02:35
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₹10 लाख का निवेश बना ₹1.25 करोड़! इस म्यूचुअल फंड ने दिया छप्परफाड़ रिटर्न

म्यूचुअल फंड में लंबी अवधि तक निवेश करने पर कंपाउंडिंग का असर कितना बड़ा हो सकता है, इसका एक दिलचस्प उदाहरण HDFC मिड कैप फंड डायरेक्ट ग्रोथ (HDFC Mid Cap Fund Direct Growth) है। अगर किसी निवेशक ने साल 2013 में इस फंड के डायरेक्ट ग्रोथ प्लान में करीब ₹10 लाख निवेश किए होते और अब तक निवेश को बनाए रखा होता, तो उसकी रकम करीब ₹1.25 करोड़ के आसपास पहुंच सकती थी, यानी शुरुआती निवेश के मुकाबले रकम 12 गुना से भी ज्यादा हो जाती। हालांकि, वास्तविक वैल्यू निवेश की सटीक तारीख और जिस तारीख को वैल्यू देखी जा रही है, उस पर निर्भर करेगी। आइए इसको जरा विस्तार से समझते हैं।2013 में लगाए ₹10 लाख का क्या हुआ? HDFC मिड कैप फंड एक ओपन-एंडेड इक्विटी म्यूचुअल फंड स्कीम है, जिसका मुख्य फोकस मिडकैप कंपनियों में निवेश करना है। HDFC MF के अनुसार, स्कीम सामान्य तौर पर अपने पोर्टफोलियो का कम से कम 65% हिस्सा मिडकैप शेयरों में रखती है। फंड का डायरेक्ट प्लान 1 जनवरी 2013 को शुरू हुआ था। उस समय डायरेक्ट ग्रोथ प्लान का शुरुआती NAV करीब ₹18.799 था। इस NAV पर अगर किसी निवेशक ने ₹10 लाख लगाए होते, तो उसे लगभग 53,194 यूनिट्स मिलतीं, बाद में NAV बढ़ने के साथ इन यूनिट्स की कीमत भी बढ़ती गई। करीब ₹231 के NAV पर इन यूनिट्स की वैल्यू लगभग ₹1.23 करोड़ बैठती है और संबंधित मूल्यांकन तारीख के आधार पर यह रकम करीब ₹1.25 करोड़ तक पहुंच सकती है। इस उदाहरण की सबसे खास बात सिर्फ यह नहीं है कि फंड ने कितना रिटर्न दिया, बल्कि यह है कि लंबे समय तक निवेश बनाए रखने और कंपाउंडिंग ने रकम को किस तरह बढ़ाया। फंड के डायरेक्ट प्लान के लिए HDFC MF के स्कीम डॉक्यूमेंट में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, स्थापना के बाद से लगभग 20.91% का वार्षिक घोषित रिटर्न दर्ज किया गया था, करीब 20% सालाना रिटर्न एक साल के नजरिए से बहुत बड़ा नहीं लग सकता, लेकिन जब यही रिटर्न लगातार कई सालों तक निवेश पर मिलता है, तो कंपाउंडिंग का असर काफी बड़ा हो जाता है। कंपाउंडिंग ने कैसे बढ़ाई रकम? मान लीजिए आपके पास ₹10 लाख हैं और उस पर लंबे समय तक औसतन करीब 20% सालाना रिटर्न मिलता है। हर साल मिलने वाला रिटर्न मूल रकम में जुड़ता जाता है और अगले साल उस बढ़ी हुई रकम पर भी रिटर्न मिलता है। यही कंपाउंडिंग है। इसी प्रक्रिया की वजह से शुरुआती ₹10 लाख धीरे-धीरे कई गुना बड़ी रकम में बदल सकते हैं। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। निवेश की यह यात्रा बिल्कुल सीधी नहीं रही होगी। शेयर बाजार में कई बार तेज गिरावट आती है और मिडकैप शेयरों में उतार-चढ़ाव बड़े लार्जकैप शेयरों की तुलना में ज्यादा हो सकता है। इसलिए 2013 में ₹10 लाख लगाने वाले निवेशक ने रास्ते में अपने निवेश की वैल्यू को कई बार काफी नीचे जाते हुए भी देखा होगा। बाजार में गिरावट के दौरान घबराकर निवेश निकाल लेने पर लंबी अवधि की रिकवरी और कंपाउंडिंग का फायदा छूट सकता है। मिडकैप फंड में जोखिम भी ज्यादा HDFC मिड कैप फंड का मुख्य निवेश मिडकैप कंपनियों में होता है। मिडकैप कंपनियां भविष्य में तेजी से बढ़ने की क्षमता रख सकती हैं, लेकिन इनके शेयरों में उतार-चढ़ाव भी अधिक हो सकता है। यही वजह है कि इस स्कीम को 'Very High Risk' कैटेगरी में रखा गया है। इसलिए केवल पुराने रिटर्न को देखकर किसी निवेशक को यह नहीं मान लेना चाहिए कि भविष्य में भी 20% या उससे अधिक सालाना रिटर्न निश्चित मिलेगा। मिडकैप फंड में निवेश करने से पहले निवेशक को अपनी जोखिम उठाने की क्षमता, निवेश की अवधि और वित्तीय लक्ष्य को ध्यान में रखना चाहिए। खासकर जिन लोगों को निकट भविष्य में पैसों की जरूरत पड़ सकती है, उनके लिए बाजार की अस्थिरता महत्वपूर्ण जोखिम बन सकती है। पुराने रिटर्न का मतलब भविष्य की गारंटी नहीं ₹10 लाख से ₹1.25 करोड़ तक पहुंचने का यह उदाहरण निश्चित रूप से कंपाउंडिंग की ताकत दिखाता है, लेकिन इसे भविष्य के रिटर्न की गारंटी नहीं समझना चाहिए। HDFC Mutual Fund भी स्पष्ट करता है कि पिछला प्रदर्शन भविष्य में दोहराया जाएगा, यह जरूरी नहीं है। फंड का रिटर्न बाजार की स्थिति, कंपनियों के प्रदर्शन, अर्थव्यवस्था और कई अन्य कारकों से प्रभावित होता है।इस उदाहरण से सबसे बड़ा सबक यह निकलता है कि इक्विटी म्यूचुअल फंड में समय और अनुशासन काफी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। बाजार में हर गिरावट से बचना या हर तेजी को पकड़ना आसान नहीं है। लंबे निवेश क्षितिज के साथ उतार-चढ़ाव को सहने की क्षमता रखने वाले निवेशकों को कंपाउंडिंग का फायदा मिल सकता है। हालांकि, किसी भी म्यूचुअल फंड में निवेश करने से पहले केवल पुराने मल्टीबैगर रिटर्न के बजाय फंड की रणनीति, जोखिम, पोर्टफोलियो, खर्च और अपने वित्तीय लक्ष्य को देखकर फैसला लेना बेहतर होता है।

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